देश को आज़ाद कराने के लिए कई लोगों ने अपनी सांसें भारत माँ के नाम लिख दी थीं। उस समय देश को आज़ादी दिलाना मानो खुद को कुर्बान करना था। देश में आंदोलन, प्रदर्शन, अंग्रेजों की खिलाफत की जंग छिड़ चुकी थी। बच्चा, बुढ़ा और जवान यहाँ तक की महिलाएं भी इस सुलग रही चिंगारी से जल रही थी। हर और अंग्रेजों के लिए हाहाकार तो था लेकिन उनके द्वारा भारतीय लोगों पर अत्याचार का शोर हद से ज़्यादा था। आखिर भारतीय लोग करें तो करें क्या ? लोग अपने परिवार के लोगों के लिए चुप-चाप सब सहन कर रहे थे। कुछ युवा थे जिन्होंने इस आग को सुझाने की कोशिश तो की थी। और हँसते हँसते कुर्बान हो गए।

जलियांवाला बाग – सन 1919 और तारीख 13 अप्रैल और शाम के करीब साढ़े चार बजे, पंजाब के लोगों का पवित्र त्यौहार बैसाखी का दिन। अमृतसर के प्रसिद्ध और पवित्र सिख प्राथना स्थल से करीब 1.5 किलोमीटर से ही दूर बना जलियांवाला बाग। जलियांवाला बाग में काफी संख्या में लोग उस समारोह में मौजूद थे। वहां हंसराज जी का भाषण चल रहा था और सिख लोग उनकी बातों को ध्यान से सुन रहे थे। तभी जनरल डायर वहां पहुंचे और बाग को बंद करने का आदेश दे दिया। और इस आदेश को सुनते ही चारों और भगदड़ मच गई थी। सिख लोग अपने बचाव के लिए जगह तलाश रहे थे। जिसे जो जगह मिली, जहाँ जगह मिली वो वहाँ छुप रहा था।

गोली चलाने वाले नहीं थके बेगुनाहों को मारते मारते

सभी दरवाजों पर अंग्रेजी सेना बन्दूक के साथ तैनात थी। बंदूकों में थी करीब 1600 राउंड गोलियां। आखिर सिख समुदाय के लोग बचकर कहाँ जाएँ। इतने में कोई समझता, तभी एक आवाज़ आयी – फायर।

बिना किसी चेतावनी के इतने बेगुनाह लोगों को बेमौत मार देना, अंग्रेजी सरकार की सबसे बड़ी गलती थी। कहा जाता है की इसमें एक हज़ार लोगों की मौत हुई थी।

लेकिन आज तक उन मारे गए लोगों की सही संख्या, किसी को भी नहीं मालुम है।

कुछ ही देर बाद बाग में चारों ओर गोलियों के छर्रे और लाशें बिछी हुई थीं। हर कोई मारा गया। अंग्रेजों से बचने के लिए सिख लोग दीवारों पर चढ़ने लगे, कुए में कूदने लगे लेकिन अंग्रेज़ों ने किसी को भी नहीं बख्शा। मासूम बच्चों ने अपने माँ – बाप को अपने आगे मरते देखा तो किसी ने अपने बच्चे की आखिरी साँसों को गिना। जिसने भी इसे देखा या सुना भयावह मंज़र कह दिया।

साल 1940 में जनरल माइकल डायर को मारा उद्यम सिंह ने, जो की जलियांवाला बाग के नरसंहार को झेल चुके थे। बाद में उद्यम सिंह हँसते हांसे फांसी पर झूल गए। इस घटना के बाद से भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे नाम इतिहास की किताबों में लिखे गए।

इस साल जलियांवाला बाग के मंजर को हुए 100 साल पूरे हो गए हैं। आज भी इस काण्ड को जो भी सुनता या पढ़ता है, उसकी रूह जरूर काँप जाती होगी। अपने परिवार के लोगों को इस नरसंहार में खोने वाले लोगों की आँखें आज भी नम हो जाती हैं।

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