एनडीए – नॉन डेमोक्रेटिक अलायन्स और यूपीए – यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायन्स। हमारे देश में केंद्र सरकार के दो प्रमुख राजनैतिक दल शामिल हैं, एक है UPA और NDA . यूपीए का नेतृत्व करती है राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी और एनडीए का नेतृत्व करती है भारतीय जनता पार्टी। राजनैतिक दल में होने के कारण, यह दोनों दल खुदसे ही लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन यह दोनों दल केंद्र में अपनी सरकार नहीं बना सकते। केंद्र में अपनी सरकार बनाने के लिए इस दल को क्षेत्रीय पार्टियों का सहयोग लेना होता है।

साल 1998 में गैर कांग्रेसी सरकार के गठन का निर्णय लिया गया था। इसके लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की घोषणा करी गई थी। इसका गठबंधन करने वाली पार्टी भारतीय जनता पार्टी ही थी। जब इसका गठन किया गया तब इस पार्टी में कुल 13 सदस्य थे। गठबंधन होने के एक साल के बाद आल इंडिया एना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने अपना समर्थन वापस लिया था। इसके बाद उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपई सरकार को कुछ ही वोटों की वजह से इस्तीफा दे दिया था। इस समय इस दल के अध्यक्ष अमित शाह हैं।

2014 के लोकसभा का चुनाव भारतीय जनता पार्टी ने 28 दलों के साथ मिलकर लड़ा था। चुनाव के बाद कई छोटे-छोटे दल भी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे। लेकिन साल 2018 में एनडीए दल के लिए मुश्किलों ने दस्तक दी। मुश्किलें यह थीं कि कई क्षेत्रीय दलों ने अलविदा कह दिया था। बिहार की हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम), नागालैंड की नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ), आंध्र प्रदेश की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी), पश्चिम बंगाल की गोरखा जनशक्ति मोर्चा, कर्नाटक की कर्णाटक प्रज्ञावंत जनता पार्टी, आदि पार्टियों ने भी एनडीए से अलविदा कह दिया था।

इस साल (2019) लोकसभा के 17वे चुनाव हुए थे। इस बार यूपीए और एनडीए सरकार के बीच में मुकाबला था। हर बार की तरह इस बार भी एनडीए की बागडोर बीजेपी के पास है। साल 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 282 सीटें मिली थीं। जोकि कुल 543 सीटों में से थीं। यह भारतीय जनता पार्टी और देश के प्रधानमंत्री के लिए बेहतरीन जीत थी। यूँ तो एनडीए में 30 से अधिक पार्टियां शामिल हैं, परन्तु इसके साथ में सात क्षेत्रीय पार्टियां भी भारतीय जनता पार्टी के लिए मददगार साबित रही हैं।

ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के ऊपर 2019 का लोकसभा चुनाव जीतना संभव नहीं लग रहा था। देश में सबसे अधिक सीट रखने वाला राज्य, उत्तर प्रदेश में कुल 80 सीटें हैं। इस साल के 2019 के चुनाव में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रिय लोकदल एक साथ मैदान में उत्तरी थी। दिल्ली में राज कर रही अरविंद केजरीवाल की आम जनता पार्टी के सामने कांग्रेस ने चुनाव लड़ने का फैसला किया था। वहीं, जम्मू-कश्मीर में पीडीपी ने अकेले चुनाव लड़ा। ओड़िसा में बीजेडी, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर और टीडीपी, पश्चिम बंगाल में टीएमसी और असम में एजीपी ने अकेले में चुनाव लड़ा था।

लेकिन अंत में 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर बाज़ी मार ली थी। अमेठी गढ़ बताने वाले राहुल गाँधी अपनी सीट नहीं बचा सके। भारतीय जनता पार्टी की उभरती नेता स्मृति ईरानी ने अच्छे खासे वोटों से जीत हासिल की। उत्तर प्रदेश में 80 में से 62 सीटें बीजेपी को हासिल हुई। जिसमें बीएसपी को 10 सीटें और एसपी को 5 सीटें मिलीं थी।

अगर विकास के बारे में बात करें तो देश के दोनों राजनैतिक दलों ने अपना अपना काम पूरी तरह से किया है। दोनों दलों से देश की जनता को काफी उम्मीद रही थी और रहेगी भी। साल 2009 से साल 2019 तक देश की अर्थव्यवस्था में काफी बदलाव देखे गए। यह बिगड़ी भी और सम्भली भी। एक रिपोर्ट के अनुसार, यूपीए की सरकार को नीतिगत विफलता और एनडीए को नोटबंदी और जीएसटी के कारण परेशानी उठानी पड़ी है। टैक्स और जीडीपी में 200 के बेसिस अंक का सुधार किया गया है। मोदी सरकार के राज में पूंजीगत खर्च बढ़ा था लेकिन बाद में उसकी स्थिति भी डगमगा गयी थी। एनडीए ने ग्रामीण विकास में ज़्यादा जोर दिया था। इनके लिए कई योजना बनाई गईं थी। एनडीए ने बैंकिंग सिस्टम को भी बढ़ाया था। एनडीए की सरकार ने यूपीए की सरकार से ज़्यादा सड़क और परिवहन के काम में ज़्यादा जोर दिया था।

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