जय हो नन्द लाल की, जय यशोदा लाल की

हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की।

मथुरा में कृष्ण जन्म की धूम मची हुई है। हर और ‘हरे कृष्णा हरे कृष्णा’, ‘हरी बोल’, ‘राधे-राधे’ जैसे बोल गूंज रहे हैं। बड़े बड़े मंदिरों को सजाया जा रहा है। मंगल गीत जा रहे हैं। मिष्ठान बनाने की तैयारी की जा रही है। पकवान बनाए जा रहे हैं। हर कोई अपने लड्डू गोपाल के आने की राह देख रहा है। गत 24 अगस्त को कृष्णजन्माष्ठमी का त्यौहार मनाया जायेगा। हर साल भाद्र महीने की अष्टमी तिथि को मनाए जाने वाला यह त्यौहार को लेकर मथुरा-वृन्दावन के मदिर सजा दिया जा चुके हैं। अब बस इंतज़ार है 24 तारीख का जब रात के 12 बजे श्रीकृष्ण जन्म लेंगे।

श्री कृष्ण के कारनामे जिन्हें कोई भी नहीं भूल सकते

कहते हैं की बचपन में श्री कृष्ण को मिट्टी खाना बेहद पसंद था। एक बार श्री कृष्ण की माँ यशोदा ने उनको मिट्टी खाते देख लिया। जब यशोदा माँ ने पूछा की क्या तुम मिटटी खा रहे हो? तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। काफी देर बाद, गुस्से में जब यशोदा माँ ने बाल कृष्ण को मुँह खोल कर दिखाने को कहा तो उन्होंने डर से मुँह खोल क्र दिखा दिया। बस फिर क्या था। जो यशोदा माँ ने देखा वो हैरान करने वाला था। यशोदा माँ ने बालक कृष्ण के मुँह में समस्त संसार को देख लिया था।

आपको याद है वो बात जब श्री कृष्ण ने कालिया नाग को सबक सिखाया था। कालिया नाग के विष से यमुना का जल पीने योग्य नहीं था। जो भी उस जल को पीता वो मर जाता। उस विष वाले जल के करीब जो भी जाता उसकी गर्मी से हर कोई झुलस जाता है। श्रीकृष्ण कालिया नाग के विष के बारे में जानते थे। एक बार कृष्ण अपने सखाओं के साथ मिलकर खेल खेल रहे थे। उनकी गेंद नदी में जाकर गिर गयी। श्रीकृष्ण के सखा ने जब उन्हें जिद्द की उस गेंद को नदी से बहार लाने के लिए। तो कृष्ण मना नहीं कर पाए। और यमुना नदी में कूद गए। जब वो नदी में गए तो उन्होंने कालिया नाग को चेतावनी दी की वह यह नदी छोड़ क्र कहीं और चला जाए क्योंकि उसके विष से समस्त प्राणी परेशान हैं। यह सुन कालिया नाग आग बबूला हो गया। उसने कृष्ण को युद्ध करके मज़ा चखाने की सोच ली। कालिया नाग ने हर वो जोर लगाया जिससे वो श्रीकृष्ण को पराजित कर सकता था। लेकिन अंत में वो कृष्ण का बाल भी बांका नहीं कर पाया। और कृष्ण ने अपने रूप में उस नाग के फन पर चढ़ कर नृत्य किया। उसपर पैरों से प्रहार करते रहे। इस मंज़र को देख वृन्दावन के सभी नर-नारी चकित हो गए।

दिवाली के अगले दिन आप भी एक त्यौहार बनाते होंगे – गोवर्धन पूजा। कहते हैं की बहुत साल पहले इस दिवाली के अगले दिन भगवान् इंद्र की पूजा की जाती थी। ताकि वर्षा अच्छी हो और किसानों को अच्छी फसल मिले। भगवान् इस्द्र को सभी देवताओं में उच्च स्थान दिया गया है। जब इस भगवान् इंद्र की पूजा की तैयारी चल रही थी तो इंद्र देवता अपने घमंड में डूबे हुए थे। भगवान् इंद्र के इस घमंड को दूर करने के लिए कृष्ण ने एक लीला रची। श्री कृष्ण ने सभी वृन्दावन वासिओं से कहा की वे लोग गोवर्धन पर्वत की पूजा करें। गोवर्धन पर्वत हमें घास देते हैं, जिन्हें हमारे पशु खाते हैं, जिससे हमें दूध मिलता है। ऐसे में हमें गोवर्धन पर्वत की ही पूजा करनी चाहिए। यह सुन समस्त लोग उनकी बात में आ गए। गोवेर्धन पूजा की तैयारियां शुरू होने लगी। यह देख इंद्र देवता क्रोध में आ गए। उन्होंने क्षेत्र में झमाझम मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। इस बारिश से हर कोई परेशान हो गया था। फिर श्री कृष्ण ने अपने बाएं हाथ की तर्जनी ऊँगली में गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। सभी वृंदावन वासी उस पर्वत के निचे आकर बच गए और गोवर्धन पर्वत महाराज ने सभी कोई बचा लिया। तभी से गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती हैं।

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