भारत माँ के बेटों की शहादत को तो कोई नहीं भूल सकता। अंग्रेजों से अपना देश वापस लेना, उनके द्वारा किए अत्याचारों को सेहन करना, उनकी मार झेलना, उनकी गोलियां खाना,और बेमौत मारे जाना। देश ने वो दो सौ साल बड़ी मुश्किल से बिताए थे।

अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेने वाले न जाने कितने थे, उनकी गिनती करना सही नहीं होगा। अंग्रेजों के आगे अपने हक़ की बात करने के लिए महिलाएं भी कम नहीं थी। हर आंदोलन में महिलाओं ने देश को आज़ाद करने की ठान ली थी, वो न ही किसी से रुकने वालों में से थीं और न ही किसी से चुप होने वाली। हर महिला के अंदर देवी दुर्गा का रूप देखने को मिलता था। आइये जानते हैं ऐसी ही कुछ महिलाओं के बारे में –

रानी लक्ष्मीबाई – ‘बुंदेले हर बोलो के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ यह कविता हर भारतीय ने जरूर सुनी और पढ़ी होगी। यह कविता उसी रानी के बारे में है जिसने अंग्रेजों से लड़ने के लिए तलवार अपने हाथों में ले ली थी। वो ही रानी जिसने अपने कुछ महीने जन्मे बच्चे को पीठ पर बाँध कर युद्ध के मैदान में खड़ी हो गई थी। यह बात साल 1857 की है जब झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने पुरुषों के कपडे पहन कर लड़ाई लड़ी थी। यूँ तो वह इस युद्ध को जीत नहीं सकी लेकिन इतिहास की किताबों अपना नाम अंकित करवा चुकी थी। उस समय अंग्रेजों ने रानी लक्ष्मीबाई के साहस और बलिदान की प्रशंसा भी की थी।

कस्तूरबा गाँधी – देश के राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गाँधी की पत्नी कस्तूरबा गाँधी ने भी अपनी मातृभूमि के लिए खूब योगदान दिया। अंग्रेजों के खिलाफ किए गए हर आंदोलन में कस्तूरबा गाँधी अपने पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती दिखीं। कई बार तो उन्होंने अकेले ही आंदोलन किए और कई बार जेल भी गयीं थी।

कमला नेहरू – एक सामान्य परिवार में पली बढ़ी कमला नेहरू, वैसे तो स्वभाव से बेहद शांत, सरल और सीढ़ी थीं। जवाहरलाल नेहरू से शादी के बाद वो इलाहाबाद में रहने लगीं थीं। लेकिन उन्होंने भी देश की बात आने पर अपने स्वभाव के विपरीत गईं। उन्होंने भी कई आंदोलनों में हिस्सा लिया। भूख हड़ताल गयीं और जेल की दीवारों को भी देखा।

सरोजिनी नायडू – हैदराबाद जन्मी सरोजिनी नायडू को लोग ‘भारत कोकिला’ और ‘नाइटिंगेल’ के नाम से भी जानते हैं। साल 1905 में हुए बंगाल के विभाजन में राष्ट्रीय आंदोलन में रहीं। 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने हिस्सा लिया था। उन्होंने इस आंदोलन की वजह से 21 महीने जेल में बिताए।

विजयलक्ष्मी पंडित – विजयलक्ष्मी, जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं। उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया था। इस आंदोलन के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। वह भारत की पहली महिला मंत्री के पद पर भी रहीं। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भी उन्होंने भारत का कई बार प्रतिनिधित्व भी किया है।

सुचेता कृपलानी – देश की आज़ादी के लिए आंदोलनों की चर्चा हो और सुचेता कृपलानी की बात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। देश के लिए भारत छोड़ो आंदलन के साथ कई प्रदर्शनों में भी वः आगे रहीं। साल 1946 में उन्हें असेंबली का अध्यक्ष चुना गया था। 15 अगस्त 1947 में हुई विधानसभा में उन्होंने वन्दे मातरम गाया था। 1958-1960 तक उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की जनरल सेक्रेटरी के पद पर रहीं। और 1963 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के पद भी संभाला।

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